शुक्रवार, 26 फ़रवरी 2021

मानव हृदय ( Human Heart)

 मानम हृदय ( Human Heart) :- परिसंचरण तंत्र का मुख्य अंग हृदय है. हृदय हमारे शरीर का एक अत्यन्त महत्वपूर्ण अंग है, यह शरीर में वक्ष के अन्दर, मध्य से थोड़ा बाई ओर स्थित है, यह सदैव धड़कता रहता है, यह विभिन्न अंगों से वापस और आए रुधिर को फेफड़ों के माध्यम से प्राप्त करता है। तथा इस रुधिर को आवश्यकता विषेश क्रियाओं के लिए सभी अंगों तक पम्प करता है।


हृदय की संरचना ( Structure of Heart) :- हृदय की रचना विशेष प्रकार की हृदपेशियों के द्वारा होती है, ये पेशियां सदैव क्रियाशील रहती ‌है फिर भी कभी थकती नहीं है, हृदय की संरचना संरचना समझने के लिए इसकी बाह्य तथा आन्तरिक रचना को समझना होगा है।


हृदय की बाह्य ‌संरचना ( External Structure of Heart) :- हृदय फेफड़ों के बीच में स्थित होता है । इसका अधिक वक्ष के बाईं ओर तथा थोड़ा सा भाग उरोस्थि ( Strernum) के दाईं ओर स्थित है, इसके पीछे की ओर वक्ष प्रदेश ( Thorax region) की पांचवीं, छठी, सातवीं कशेरुकी ( Vertebrae) स्थित है ।एक स्वस्थ व्यक्ति का हृदय लगभग 13 सेमी लम्बा और 9 सेमी चौड़ा होता है, प्रायः इसका आकार व्यक्ति की बन्द मुट्ठी के समान होता है, इसका भार लगभग 300 ग्राम तथा रंग गहरा लाल होता है।

                        हृदय विशेष प्रकार की हृदयी पेशियों का बना होता है, हृदय के बाहरी भाग पर एक झिल्ली होती है जिसे हृदयीवरण ( Pericardium) कहते हैं, इस आवरण की दो पर्तें होती हैं इन पर्तों के बीच एक गाढ़ा व चिकना तरल पदार्थ भरा रहता है। यह हृदय की गति में सहायता करता है तथा इसका बाहरी आघातों इत्यादि से बचाव करता है, 

        हृदय एक तिकोनी संरचना होती है, इसका पतला भाग नीचे की ओर तथा कुछ बाईं ओर झुका रहता है। इसके ऊपरी भाग से कई बड़ी- बड़ी रुधिर वाहिनियां निकालती हैं इनमें से एक महाधमनी चाप ( Arotic arch) निकलता है, जो इसकी पृष्ठ सतह पर घूमकर नीचे की ओर चला जाता है, इसके अतिरिक्त अग्र ( Anterior) तथा पश्व महाशिराएं ( Posterior veins) होती है, जो शरीर के विभिन्न भागों से हृदय में रुधिर लाती हैं। 


 हृदय की आन्तरिक रनचा (  Internal Structure of Heart) हृदय भीतर से खोखला होता है, इसको चीरकर देखने से यह चार कक्षों में बंटा हुआ है दिखाई देता है, दो भाग दाईं ओर तथा दो भाग बाईं तथा ओर होते हैं दोनों के बीच में पेशी सूत्रों की बनी हुई एक मोटी भित्ति होती है इसके चार भाग होते हैं। 


1. दायां अलिन्द ( Right Auricle)

2. दायां निलय   ( Right Ventricle)

3. बायां अलिन्द ( Left Auricle)

4. बायां निलय   ( Left Ventricle) 


प्रत्येक भाग के अलिन्द तथा निलय के बीच पतले कपाट ( Valves) होतें हैं जो केवल अलिन्द से निलय में ही रुधिर को आने देता है, उल्टा नहीं लौटने देते ,ये कपाट रेशे ऊतकों से बने होते हैं तथा पेशी तन्तुओं से इनके खुलने बन्द होने की क्रिया नियंत्रित होती है दाएं भाग में स्थित कपाटों को त्रिवलन कपाट ( Tricuspid valve ) तथा बाएं भाग में स्थित कपाटों को द्विवलन कपाट‌ ( Bicupid valve) कहते हैं ।


शरीर के विभिन्न भागों को जाने वाली नलिकाएं अर्थात शिराएं मिलकर महाशिराएं अलिंदों में खुलती हैं, 

              दाहिने अलिन्द में फेफड़ों को छोड़कर शेष शरीर से रुधिर आता है , अतः ऑक्सीजन होता है.जो दाहिने निलय में होकर फेफड़ों को फुफ्फुस धमनी (Pulmonary artery) से होकर चला जाता है , इसी प्रकार फेफड़ों से ऑक्सीजनयुक्त रुधिर शिराओं के द्वारा बाएं अलिन्द में आता है और बाएं निलय में होकर शरीर को अलग महाधमनियों के द्वारा भेज दिया जाता है ।

मनुष्य के हृदय का कार्य तथा क्रिया विधि : - हृदय का प्रमुख कार्य शरीर के विभिन्न भागों में रुधिर पहुंचाना है हृदय ही शरीर के विभिन्न भागों से रुधिर को ग्रहण करता है।

2. हृदय शरीर में रुधिर को पम्प करने का कार्य करता है . इस कार्य के लिए हृदय प्रत्येक समय सिकुड़ता तथा फैलता है तथा हृदय के सिकुड़न को प्रकुंचन ( Systole ) तथा फैलने को अनुशिथिलन ( Diastole ) कहते हैं। 


दोहरा रक्त परिसंचरण ( Double Blood Circulation) :- जब रुधिर शरीर के सभी अंगों में प्रवाहित होने के लिए हृदय से दो बार प्रवाहित होता है , तो ऐसे परिसंचरण को " दोहरा परिसंचरण" कहते हैं।

        पक्षियों तथा स्तनियों में दोहरा परिसंचरण तंत्र पाया जाता है।


Notes Point : - बाएं निलय से शुद्ध रक्त " कैरोटिको सिस्टैमिक चाप" द्वारा शरीर के सारे अंगों को जाता है, पूरे से अशुद्ध रुधिर महाशिराओं द्वारा दाएं अलिन्द में लाया जाता है। दायां निलय अशुद्ध रुधिर को पल्मोनरी चाप द्वारा  फेफड़ों में शुद्ध होने के लिए भेज देता है,

                                              शुद्ध रुधिर पल्मोनरी शिरा द्वारा बाएं अलिन्द में लाया जाता है , यहां से बाएं निलय द्वारा यह शुद्ध रुधिर सारे शरीर में प्रवाहित कर दिया जाता है ।


 दोहरे परिसंचरण का महत्व -  दोहरे परिसंचरण तंत्र  हृदय में अलिन्द तथा दो निलय हैं , इस कारण हृदय में शुद्ध रुधिर तथा अशुद्ध रुधिर अलग-अलग रहते हैं हृदय के दाएं भाग में सारे शरीर से अशुद्ध रुधिर आता है तथा यह रुधिर पल्मोनरी चाप द्वारा फेफड़ों में शुद्ध होने के लिए चला जाता है हृदय के बाएं भाग में पल्मोनरी शिराओं द्वारा शुद्ध रुधिर आता है तथा यह कैरोटिको सिस्टैमिक चाप द्वारा सारे शरीर में प्रवाहित हो जाता है।

                               इस प्रकार दोहरे परिसंचरण में कहीं भी शुद्ध व अशुद्ध रुधिर का मिश्रण न होने के कारण परिसंचरण अधिक प्रभावशाली होता है. इसके अतिरिक्त अलग-अलग कक्ष होने के कारण रुधिर प्रवाह के लिए अधिक दाब उत्पन्न होता है।


हृदय स्पंदन ( Heart Beat) :- हृदय स्पंदन मांशपेशियों में संकुचन एवं शिथिलन के कारण होता है.हृदय‌ स्पंदन का प्रारंभ दाएं अलिन्द में स्थित शिरा अलिन्द घुण्डी से होता है . इसे स्पंदन केन्द्र या पेसमेकर भी कहते हैं हृदय स्पंदन दाएं अलिन्द से प्रारंभ होकर बाएं अलिन्द में और फिर पेशीय तन्तुओं द्वारा निलय की भित्ति में होता है. निलय में संकुचन के कारण रक्त धमनियों द्वारा शरीर के विभिन्न अंगों में पम्म कर दिया जाता है हृदय के एक नियमित गति से क्रमशः संकुचित ( प्रकुंचन Systole) तथा शिथिल ( अनुशिथिलन - Diastole) होता है , संकुचन और शिथिलन होने कि क्रिया को "हृदय स्पंदन" ( Heart Beat) कहते हैं , स्वस्थ मनुष्य में हृदय स्पंदन 72 प्रति मिनट होता है .एक स्पंदन लगभग 0-8 सेकण्ड में होता है।


रुधिर वाहिनियां ( Blood Vessels):- मनुष्य में रक्त परिसंचरण बन्द प्रकार का होता है , मनुष्य के शरीर में रक्त वाहिनियों का जाल फैला रहता है।


1- धमनियां ( Arteries) :- ये हृदय से रक्त को शरीर के विभिन्न अंगों तक पहुंचाती हैं , इनकी भित्ति मोटी व लचीली होती है धमनियों में रुधिर अत्यधिक दाब के साथ बहता है धमनियों में शुद्ध रक्त प्रवाहित होता है ,यह रक्त ऑक्सीजन युक्त होने के कारण गहरे लाल रंग का होता है , धमनियों की संकरी गुहा ( Lumen ) में कपाट ( Valves) नहीं पाए जाते हैं धमनियों की छोटी शाखाओं को धमनिका ( Artriole) कहते हैं।


2- शिराएं (Veins) ये अंगों से रुधिर को वापस हृदय में लाती हैं , शिराओं की भित्ति महीन व चिपकने वाली होती है शिराओं में अशुद्ध रुधिर बहता है। तथा रुधिर बहुत दाब के साथ बहता है शिराओं की भित्ति में पेशीय स्तर बहुत पतला होता है इनकी गुहा काफी चौड़ी होती है तथा इसमें थोड़ी- थोड़ी दूरी पर कपाट लगे होते हैं ये अर्धचंद्राकार कपाट रुधिर को एक ही दिशा में बहने देते हैं।


3- केशिकाएं ( Capillaries) :- केशिकाएं शिराओं और धमनियों को आपस में जोड़ती हैं , ऊतकों में पहुंच कर धमनिकाएं महीन शाखाओं का जाल बनाती हैं जिन्हें केशिकाएं कहते हैं . केशिकाओं की भित्ति केवल अन्तः स्तर ( Endothelium) के एक स्तर की बनी होती हैं केशिकाओं में रुधिर प्रवाह की गति बहुत धीमी होती है ,केशिकाएं आपस में मिलकर शिराकाएं बनाती हैं , शिराकाएं आपस में मिलकर शिरा बनाती हैं।



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